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बीकानेर का जिला अस्पताल: जहाँ इच्छा शक्ति ने बदली सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर, छोटे अस्पताल से उभरता “अर्बन हेल्थ मॉडल”, युवा डॉक्टरों और बेहतर नेतृत्व ने जगाई नई उम्मीद — विनय थानवी

On: May 17, 2026 5:43 PM
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बीकानेर अपडेट.भारत में सरकारी अस्पतालों को लेकर आम धारणा अक्सर निराशाजनक रही है। भीड़, रेफरल, संसाधनों की कमी और अव्यवस्थित व्यवस्थाओं के बीच आम मरीज यह मान चुका था कि बेहतर इलाज केवल बड़े मेडिकल कॉलेजों या निजी अस्पतालों में ही संभव है। लेकिन राजस्थान के बीकानेर का जिला अस्पताल इस सोच को धीरे-धीरे बदल रहा है।

यह बदलाव किसी एक मशीन, भवन या बजट से नहीं आया। इसके पीछे प्रशासनिक इच्छाशक्ति, राजनीतिक संवेदनशीलता और युवा चिकित्सकों की कार्य संस्कृति का बड़ा योगदान है।

बीकानेर पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास ने पिछले कुछ वर्षों में शहरी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जिस गंभीरता से काम किया, उसका असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। वहीं जिला अस्पताल के अधीक्षक डॉ. सुनील हर्ष ने एक कुशल प्रशासक और चिकित्सक के रूप में अस्पताल की व्यवस्थाओं को केवल संभाला ही नहीं, बल्कि उन्हें परिणाम देने वाली प्रणाली में बदलने का प्रयास किया।

एक समय था जब जिला अस्पताल से अधिकांश गंभीर मरीजों को तुरंत पीबीएम अस्पताल रेफर कर दिया जाता था। गायनोकोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स और सर्जरी जैसे विभागों में जटिल मामलों का उपचार लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है।

स्त्री एवं प्रसूती रोग विशेषज्ञ डॉ. मोनिका रंगा अब जिला अस्पताल में जटिल स्त्री रोग ऑपरेशन कर रही हैं। ऑर्थोपेडिक्स विभाग में अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. लोकेश सोनी गंभीर हड्डी एवं ट्रॉमा सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दे रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर का वर्षों तक सीमित उपयोग होता रहा, आज वही ओटी लगातार सक्रिय है और अनेक विशेषज्ञ चिकित्सक उसका उपयोग कर मरीजों को राहत दे रहे हैं।

यह केवल चिकित्सा सेवा का विस्तार नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम में “वर्क कल्चर” के बदलने का संकेत है।

हाल ही में कई ऐसे केस सामने आए जिनमें जिला अस्पताल के चिकित्सकों ने समय रहते गंभीर मरीजों का सफल उपचार कर उन्हें नया जीवन दिया। चिकित्सक डॉ. योगेश साध द्वारा गंभीर स्थिति में पहुंचे सोमेश थानवी नामक मरीज का जीवन बचाने की घटना शहर में चर्चा का विषय बनी। ऐसे उदाहरण यह बताते हैं कि यदि जिला स्तर पर विशेषज्ञता और निर्णय क्षमता मौजूद हो, तो बड़े अस्पतालों पर अनावश्यक दबाव भी कम किया जा सकता है।

बीकानेर का जिला अस्पताल आज शहरी क्षेत्र के लाखों मरीजों के लिए “पहला भरोसा” बनता जा रहा है। यही किसी भी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता होती है।

लेकिन इस सकारात्मक तस्वीर के बीच कुछ गंभीर सवाल अब भी मौजूद हैं। वर्ष 2020 में राज्य सरकार ने जिला अस्पतालों में मेडिकल कॉलेज से “यूनिट सिस्टम” लागू करने की अवधारणा प्रस्तुत की थी। इसका उद्देश्य था कि मेडिकल कॉलेजों की विभिन्न यूनिटें जिला अस्पतालों में नियमित सेवाएँ दें, ताकि विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएँ आमजन तक पहुँच सकें।

दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि बीकानेर जैसे महत्वपूर्ण शहर में आज तक यह व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकी। यदि मेडिकल कॉलेज की यूनिट्स नियमित रूप से जिला अस्पताल में संचालित होने लगें, तो यह अस्पताल प्रदेश के सबसे मजबूत अर्बन सेकेंडरी हेल्थ सेंटर के रूप में विकसित हो सकता है।

बतौर पत्रकार और विनय एक्सप्रेस के संपादक होने के नाते मेरा स्पष्ट मानना है कि बीकानेर जिला अस्पताल में अपार संभावनाएँ हैं। यहाँ आधारभूत संरचना है, मॉड्यूलर ओटी है, युवा विशेषज्ञ चिकित्सक हैं, जनता का भरोसा बढ़ रहा है और राजनीतिक समर्थन भी दिखाई देता है। कमी केवल उस संस्थागत समन्वय की है जो मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल के बीच मजबूत पुल का काम कर सके।

यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवाओं का भविष्य केवल बड़े सुपर स्पेशियलिटी संस्थानों में नहीं, बल्कि मजबूत जिला अस्पतालों में छिपा है। क्योंकि भारत का मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग सबसे पहले इन्हीं अस्पतालों के दरवाजे पर पहुँचता है।

बीकानेर का जिला अस्पताल आज एक संदेश दे रहा है —

अगर नीयत साफ हो, नेतृत्व सक्रिय हो और डॉक्टरों को काम करने की स्वतंत्रता मिले, तो छोटा सरकारी अस्पताल भी बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकता है।

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